छेड़ने का तो मज़ा तब है कहो और सुनो;
बात में तुम तो ख़फ़ा हो गये, लो और सुनो;
तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुम को;
छोड़ देवेगा भला, देख तो लो, और सुनो;
यही इंसाफ़ है कुछ सोचो तो अपने दिल में;
तुम तो सौ कह लो, मेरी एक न सुनो और सुनो;
आफ़रीं तुम पे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें;
देख रोता मुझे यूँ हँसने लगो और सुनो;
बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर;
ऐसे ही ढँग से सुनाऊँ के सुनो और सुनो।
बात में तुम तो ख़फ़ा हो गये, लो और सुनो;
तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुम को;
छोड़ देवेगा भला, देख तो लो, और सुनो;
यही इंसाफ़ है कुछ सोचो तो अपने दिल में;
तुम तो सौ कह लो, मेरी एक न सुनो और सुनो;
आफ़रीं तुम पे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें;
देख रोता मुझे यूँ हँसने लगो और सुनो;
बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर;
ऐसे ही ढँग से सुनाऊँ के सुनो और सुनो।
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